मेरे हुसैन ने इस्लाम का सच्चा चेहरा दिखाने के लिए मदीना छोड दिया ना कि परवाह अली अकबर चला जायेगा ना कि परवाह अब्बास चले जायेँगे ना कि परवाह बचपन अली अशगर का चला जायेगा ना कि परवाह कासिम कि जवानी लुट जायेगी ना कि मेरे हुसैन ने किसी चीज कि परवाह बल्कि तुम्हेँ इस्लाम का सच्चा चेहरा दिखाने के लिए मदीना भी छोड दिया आ गये मक्का . मक्का मेँ भी मेरे हुसैन को यजिदियोँ ने नहि छोडा खत पे खत डेढ सौँ खतोँ का ताँता बाँध दिया मजबूरन मेरे हुसैन को मक्का भी छोडना पडा गये मेरे हुसैन इस्लाम बचाने के लिए कूफा कि तरफ .तकदीर ने कूफा जाने नही दिया अभी रास्ते मेँ हैँ दोपहर का वक्त है अभी सामान उतरा भी नहीँ है दुश्मन की फौज आ गयी इमामे हुसैन को गिरफतार करने लिए मेरे हुसैन ने सामान उतारा दुश्मन के जानवरोँ को देखा जानवर प्यासे है घोडे प्यासे हैँ मेरा हुसैन जो पानी अली असगर के लिए लाया था जो पानी अली अकबर के लिए लाया था जो पानी सकीना के लिए लाया था मेरा हुसैन जो पानी छोटे छोटे बच्चोँ के लिए लाया था वो पानी मेरे हुसैन ने दुशमनोँ के जानवरोँ को पिला दिया.... खुद तो खाते नही औरोँ को खिला देते हैँ कैसे साबिर हैँ आका के घराने वाले ....मेरे हुसैन को जो गिरफ्तार करने आये थे मेरे हुसैन ने उंन्ही के जानवरोँ को पानी पिला दिया छोटे छोटे बरतन पानी के खाली हो गये आ गया नमाज का वक्त मेरे हुसैन ने इन गिरफ्तार करने वालोँ से फरमाया हुर एक बात बताओ हमारे खेमे मे आजान हो गयी तुम अपनी जमात अलग करोगे कि हमारे साथ नमाज पढोगे इमामे हुसैन ने अपने खेमे आजान कहलवा कर ऐलान करवा दिया ऐ यजिदियोँ सुन लो कोई हुसैनी तुम्हारी इबतेदा मेँ नमाज नही पढेगा तुम हमारे नजदीक इमामत के लायक नही हो हमारी नमाज तुम्हारे पीछे नही होगी तुम भी अपने आप को मुसलामन कहलाते हो तुम हो यजिदी हम भी अपने आप को मुसलमान कहलाते हैँ लेकिन हम हैँ हुसैनी ..ऐलान करवा दिया किसी हुसैनी कि नमाज किसी यजिदी के पीछे नही होगी लेकिन उनकी ये हिम्मत नही थी कि बारगाहे हुसैनी मेँ लब खोल के ये कह सके कि हम भी अपनी जमात अलग करेँगेँ बल्कि हुर ने क्या कहा ऐ इबने रसूल अल्लाह आप परवाह मत किजिए नमाज तो हम आप के पीछे ही पढेँगेँ इन यजिदियोँ कि ये हिम्मत ना हुई कि ये कह पाते कि हम भी नमाज आप के पीछे नही पढेँगेँ क्योँ कि इनकी आत्मा जानती थी रुह पहचानती थी कि सच्चे यही हैँ हक वाले यही हैँ हम तो झूठे हैँ हम तो मक्कार हैँ हम तो गद्दार हैँ हम नमाज जरुर पढते हैँ कलमा जरुर पढते हैँ तिलावत जरुर करते हैँ लेकिन सच्चाई हमारे साथ नही है.......ये वही कौम के लोग हैँ जो आज इमामे हुसैन कि शहादत पर मातम करते है ताजिया रखते हैँ बेहुरमती करते हैँ और कहते हैँ हम हुसैनी हैँ ........
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