Saturday, 24 October 2015

Badshah-e-Hussain

शाने हूसैन
अलयहिस्सलाम

एक मर्तबा इमाम हूसैैन खेलते खेलते एक बाग मे चले गये
सय्यदा फातेमा ने नबी ए पाक से अर्ज
की बाबा जान मै परेशान. हो गयी हू . हुसैन
को ढुंढते सुबह से दोपहर हो गयी
अब तक लौटा नही
अल्लाह के नबी ने फरमाया बेटी मैं
उसे ले आता हू नबी ए पाक के साथ फिज्जा और
हजरत अली भी गये
ढुंढते हुये रास्ते मे एक बाग की तरफ रुख किया तो
क्या देखा के तपती हुइ रेत पर हुसैने पाक आराम
से
सो रहे हैं
सरकार देख कर मुस्कुराये
फिज्जा और जो लोग देख रहे थे उन्होने कहा सरकार. आप हुसैन
को तपती हुइ रेत पर देखकर आप बेकरार
नही होते और आप मुस्कुरा रहे हैं . तो
नबी ए पाक ने फरमाया तुम देख रहे हो हुसैन
तपती रेत पर सोया हैं
मैं देख रहा हू नीचे एक फरिश्ते का पर बिछा हैं
और उपर एक फरिश्ते का सायबान हैं मेरा हुसैन इस सान से सोया
हैं  ! और इतने मे ही इमाम हुसैन की
आंख खुल गयी कहा नाना जान मुझे
भुख
लगी हैं मुझे खाना चाहिए. आका ने कहा बेटे घर
चलो तुम्हारी मा तुम्हें ढुंढ रही है
वही पर खाना खा लेना हुसैन ने कहा
नही नाना मुझे यही चाहिए. .
जीद पर आ गये हुजूर ने कहा बेटा घर चल कर
खा लेना हुसैन ने कहा नहीं नाना यही
खाउगां
अभी ये बात हो ही
रही थी के जिब्रील
अलयहिस्सलाम
जन्नत से खाना ले कर अाये और अर्ज की या रसुललुल्ला
सलल्ललाहो अलयहे वस्सलम अल्लाह की
मर्जी हैं आप हुसैन को ना रुलाये हुसैन का रोना
अल्लाह को पसंद नही आता हुजूर ये खाना आप
हुसैन को खिलाये
बचपन मे आरजू की तो खाना खुदा ने जन्नत से भेज
दिया
कल मैदानें कर्बला मे कोइ ये ना रह सके  हुसैन
खाने और पानी के लिये मजबूर थे
नहीं
अरे
वो
तो
बादशाह थे बादशाह. हैंऔर बादशाह रहेंगें

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